गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न भेद ।
गुरु बिन संशय न मिटे, जय जय जय गुरूदेव ।।
तीरथ का है एक फल, संत मिले फल चार ।
सदगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ।।
भव भ्रमण संसार दुःख, ता का वार ना पार ।
निर्लाेभी सदगुरु बिना, कौन उतारे पार ।।
पूरा सदगुरु सेवतां, अंतर प्रगटे आप ।
मनसा वाचा कर्मणा, मिटें जन्म के ताप ।।
समदृष्टि सदगुरु किया, मेटा भरम विकार ।
जहँ देखो तहँ एक ही, साहिब का दीदार ।।
आत्मभ्रांति सम रोग नहीं, सदगुरु वैद्य सुजान ।
गुरु आज्ञा सम पथ्य नहीं, औषध विचार ध्यान ।।
सदगुरु पद में समात हैं, अरिहंतादि पद सब ।
तातैं सदगुरु चरण को, उपासौ तजि गर्व ।।
बिना नयन पावे नहीं, बिना नयन की बात ।
सेवे सदगुरु के चरण, सो पावे साक्षात ।।

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