Saturday, 22 November 2025

ब्रह्मज्ञानावलीमाला



सकृच्छ्रवणमात्रेण ब्रह्मज्ञानं यतो भवेत् ।
ब्रह्मज्ञानावलीमाला सर्वेषां मोक्षसिद्धये ॥ १॥
असङ्गोऽहमसङ्गोऽहमसङ्गोऽहं पुनः पुनः ।
सच्चिदानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ २॥
नित्यशुद्धविमुक्तोऽहं निराकारोऽहमव्ययः ।
भूमानन्दस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ३॥
नित्योऽहं निरवद्योऽहं निराकारोऽहमुच्यते ।
परमानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ४॥
शुद्धचैतन्यरूपोऽहमात्मारामोऽहमेव च ।
अखण्डानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ५॥
प्रत्यक्चैतन्यरूपोऽहं शान्तोऽहं प्रकृतेः परः ।
शाश्वतानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ६॥
तत्त्वातीतः परात्माहं मध्यातीतः परः शिवः ।
मायातीतः परंज्योतिरहमेवाहमव्ययः ॥ ७॥
नानारूपव्यतीतोऽहं चिदाकारोऽहमच्युतः ।
सुखरूपस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ८॥
मायातत्कार्यदेहादि मम नास्त्येव सर्वदा ।
स्वप्रकाशैकरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ९॥
गुणत्रयव्यतीतोऽहं ब्रह्मादीनां च साक्ष्यहम् ।
अनन्तानन्तरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ १०॥
अन्तर्यामिस्वरूपोऽहं कूटस्थः सर्वगोऽस्म्यहम् ।
परमात्मस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ ११॥
निष्कलोऽहं निष्क्रियोऽहं सर्वात्माद्यः सनातनः ।
अपरोक्षस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ १२॥
द्वन्द्वादिसाक्षिरूपोऽहमचलोऽहं सनातनः ।
सर्वसाक्षिस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ १३॥
प्रज्ञानघन एवाहं विज्ञानघन एव च ।
अकर्ताहमभोक्ताहमहमेवाहमव्ययः ॥ १४॥
निराधारस्वरूपोऽहं सर्वाधारोऽहमेव च ।
आप्तकामस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ १५॥
तापत्रयविनिर्मुक्तो देहत्रयविलक्षणः ।
अवस्थात्रयसाक्ष्यस्मि चाहमेवाहमव्ययः ॥ १६॥
दृग्दृश्यौ द्वौ पदार्थौ स्तः परस्परविलक्षणौ ।
दृग्ब्रह्म दृश्यं मायेति सर्ववेदान्तडिण्डिमः ॥ १७॥
अहं साक्षीति यो विद्याद्विविच्यैवं पुनः पुनः ।
स एव मुक्तः सो विद्वानिति वेदान्तडिण्डिमः ॥ १८॥
घटकुड्यादिकं सर्वं मृत्तिकामात्रमेव च ।
तद्वद्ब्रह्म जगत्सर्वमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥ १९॥
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।
अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥ २०॥
अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः प्रत्यग्ज्योतिः परात्परः ।
ज्योतिर्ज्योतिः स्वयंज्योतिरात्मज्योतिः शिवोऽस्म्यहम् ॥ २१॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
ब्रह्मज्ञानावलीमाला सम्पूर्णा ॥
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ब्रह्मज्ञानावलीमाला — काव्यमय हिंदी भावार्थ
(आदि शंकराचार्य कृत)
सकृच्छ्रवणमात्रेण ब्रह्मज्ञानं यतो भवेत् ।
ब्रह्मज्ञानावलीमाला सर्वेषां मोक्षसिद्धये ॥ १.
काव्यमय अर्थ :
ज्यों ही ब्रह्मज्ञान का संदेश कानों में उतर जाए,
अज्ञान का अंधेरा मिटकर मुक्ति का सूरज जग जाए।
यह ज्ञान की माला सबको मोक्ष की राह दिखाती है।
असङ्गोऽहमसङ्गोऽहमसङ्गोऽहं पुनः पुनः । सच्चिदानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥ २॥

मैं असंग, निरबंधन, स्वतंत्र चेतन ज्योति हूँ—
सत्-चित्-आनंद से भरा, न कभी घटूँ, न मिटूँ।
नित्यशुद्धविमुक्तोऽहं… भूमानन्दस्वरूपोऽहम…
काव्यमय अर्थ :
मैं नित्य, शुद्ध, मुक्त, निराकार ब्रह्म स्वरूप।
असीम आनंद ही मेरा रूप—
अनश्वर, अविनाशी, अमर ज्योति मैं ही हूँ।३.
नित्योऽहं निरवद्योऽहं… परमानन्दरूपोऽहम…
काव्यमय अर्थ :
नित्य हूँ, निर्दोष हूँ, निराकार मेरा सत्य।
परमानंद ही मेरा स्वरूप—
मैं ही हूँ वह अविनाशी सत्ता। ४.
शुद्धचैतन्यरूपोऽहम… अखण्डानन्दरूपोऽहम…
काव्यमय अर्थ :
मैं शुद्ध चैतन्य—जागृत, निर्मल, स्वयं-प्रकाश।
मन को रमाने वाला, अखंड आनंद का प्रकाश।
प्रत्यक्चैतन्यरूपोऽहं… शाश्वतानन्दरूपोऽहम…
काव्यमय अर्थ :
मैं भीतर चमकती प्रत्यक्ष चेतना हूँ।
शांत, प्रकृति से परे, शाश्वत आनंद की धारा हूँ। ६.
तत्त्वातीतः… मायातीतः परंज्योतिः…
काव्यमय अर्थ :
तत्त्वों से परे, मध्य और अंत से परे मैं ही हूँ।
माया से परे, परम ज्योति का स्त्रोत मैं ही हूँ। ७.
नानारूपव्यतीतोऽहं… सुखरूपस्वरूपोऽहम…
काव्यमय अर्थ :
अनेक रूपों से परे, केवल चिद्घन प्रकाश।
सुख ही मेरा स्वभाव, आनंद ही मेरी प्यास। ८.
मायातत्कार्यदेहादि मम नास्त्येव…
काव्यमय अर्थ :
यह शरीर, मन, माया—सब मेरे नहीं।
मैं स्वयंस्फूर्त, उज्ज्वल, प्रकाश ही प्रकाश हूँ। ९.
गुणत्रयव्यतीतोऽहं…
काव्यमय अर्थ :
तीन गुणों (सत्व-रजस्-तमस्) से भी परे मेरा स्थान।
ब्रह्मादि सबमें मैं ही साक्षी, अनंत रूपों का प्राण। १०.
अन्तर्यामिस्वरूपोऽहं…
काव्यमय अर्थ :
मैं सबके भीतर छिपा अन्तर्यामी।
कूटस्थ—अचल—अनादी ज्योति, सर्वव्यापी मैं ही। ११.
निष्कलोऽहं निष्क्रियोऽहं…
काव्यमय अर्थ :
मैं निष्कल, निस्पंद, न किसी कर्म में लिप्त।
प्रत्यक्ष अनुभव का परमात्मा, सनातन स्वरूप।१२.
द्वन्द्वादिसाक्षिरूपोऽहम…
काव्यमय अर्थ :
सुख-दुख, हार-जीत—सब द्वंद्वों का साक्षी हूँ।
अचल, सनातन, सर्व-साक्षी आत्मा मैं ही हूँ। १३.
प्रज्ञानघन एवाहं… अकर्ताहमभोक्ताहम्…
काव्यमय अर्थ :
ज्ञान का घन, बुद्धि का सार, चैतन्य का नाद मैं।
न करता, न भोगता—सबके पार मैं ही हूँ। १४.
निराधारस्वरूपोऽहं…
काव्यमय अर्थ :
मेरा कोई आधार नहीं—मैं ही सबका आधार।
पूर्ण, सिद्ध, आप्तकाम—मुझमें ही जगत का सार। १५.
तापत्रयविनिर्मुक्तो… अवस्थात्रयसाक्ष्यस्मि…
✨ काव्यमय अर्थ :
तीन तापों, तीन देहों, तीन अवस्थाओं से परे—
जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति का साक्षी मैं ही खरे। १६.
दृग्दृश्यौ द्वौ पदार्थौ…
काव्यमय अर्थ :
देखने वाला और दृश्य—दो हमेशा अलग।
द्रष्टा ब्रह्म, दृश्य माया—वेदांत का यह नगाड़ा सघन। १७.
अहं साक्षीति यो विद्याद्…
काव्यमय अर्थ :
जो कहे—“मैं साक्षी हूँ”—और ऐसा बार-बार जाणे,
वही मुक्त, वही विद्वान—वेदांत यही जानें। १८.
घटकुड्यादिकं सर्वं मृत्तिकामात्रम्…
काव्यमय अर्थ :
घड़ा दीवार सब मिट्टी रूप—यह जग भी ब्रह्म समान।
एक ही तत्व से बना सब—वेदांत का यही ज्ञान। १९.
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या…
काव्यमय अर्थ :
ब्रह्म ही सत्य, जगत माया, जीव ब्रह्म ही एक।
यही जानना असली शास्त्र—वेदांत का परम लेख। २०.
अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः…
काव्यमय अर्थ :
अंदर भी ज्योति, बाहर भी ज्योति—ज्योति ही मेरा सार।
ज्योतियों की ज्योति—स्वयं-प्रकाश—शिव-स्वरूप मैं अपार। २४.
समापन
“मैं ब्रह्म हूँ”—जो इस सत्य को हृदय में उतार ले,
उसे और कुछ जानना शेष नहीं।

Monday, 17 November 2025

श्री आशारामायण


 श्री आशारामायण

Shri Asharamayan

गुरुवन्दना 


गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः ।

गुरूर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।

 

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।

 

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। 


त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ।।

 

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं

भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरूं तं नमामि ।।